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व्याधिक्षमत्व बढ़ाने के लिये 168 मिनट प्रति सप्ताह वनानुभव लीजिये- डॉ अनुपम आदित्य मिश्र, एम डी

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💫प्राचीन भारत के महर्षि-वैज्ञानिक पुनर्वसु आत्रेय को चिकित्सा व स्वास्थ्य-रक्षण के एक ऐसे सिद्धांत का जनक माना जाता है जिसे आज वनानुभव और प्रकृति-अनुभव (फ़ॉरेस्ट -एक्सपीरियंस, नेचर-एक्सपीरियंस) आदि नामों से जाना जाता है| स्वास्थ्य-रक्षण और रोगोपचार में प्राकृतिक स्थलों की भूमिका का आयुर्वेद में कम से कम 1000 साल ईसा पूर्व से वर्णन प्राप्त होता है| हाल ही में हुई शोध अब यह निर्विवाद सिद्ध करती है कि प्रकृति का सानिध्य हमारे संज्ञानात्मक, भावनात्मक, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक और बायोफिज़ियोलॉजिकल स्वास्थ्य में सुधार करता है| परन्तु सबसे बड़ी बात यह है कि वर्ष 2022 तक की शोध अब यह निर्विवाद सिद्ध कर चुकी है कि वनानुभव से ह्यूमन नेचुरल किलर सेल्स की क्रियात्मकता बढ़ने और इन्फ्लेमेशन कम होने सहित अनेक रास्तों के माध्यम से इम्म्यूनिटी भी बढ़ती है|

💫लगभग 5000 वर्ष पूर्व की बात है| आत्रेय के शिष्य अग्निवेश ने अपने गुरु से एक प्रश्न किया: “भगवन! देखने में आता है कि हितकारी आहार का उपयोग करते हुये भी कुछ लोग रोगी हो जाते हैं, जबकि अहितकारी आहार लेते हुये भी कुछ लोग निरोगी देखे जाते हैं। ऐसी स्थिति में क्या अच्छा है और क्या बुरा इसकी पहचान कैसे की जाये?” इस प्रश्न का जो उत्तर आत्रेय ने दिया, वह आज भी यथावत विज्ञान-संगत है।

💫आत्रेय का उत्तर था: “अग्निवेश! हितकारी आहार करने वाले लोगों में आहार के कारण होने वाले रोग उत्पन्न नहीं होते और हितकारी आहार लेने मात्र से समस्त रोगों का भय दूर नहीं हो जाता। हानिकारक भोजन के अलावा भी रोगों के तमाम कारण, जैसे ऋतुओं का विपरीत होना, प्रज्ञापराध या जानबूझकर गलती करना, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध का अतियोग, मिथ्या योग एवं विषम योग आदि ऐसे कारण हैं जो उचित भोजन लेने के बावजूद भी मनुष्य को बीमार कर देते हैं। इसीलिये हितकारी आहार लेने वाले रोगी हो जाते देखे जाते हैं। हानिकारक आहार का उपयोग करने वालों में पथ्य, आहार, व शरीर की स्थिति में भिन्नता होने से हानिकारक आहार तुरन्त हानि नहीं पहुंचा पाते। सभी अपथ्य बराबर दोष वाले नहीं होते, न ही सभी दोष बराबर बलवान होते, और न सभी शरीर व्याधिक्षमत्व या रोग प्रतिरोधक क्षमता से संपन्न होते (न च सर्वाणि शरीराणि व्याधिक्षमत्वे समर्थानि भवन्ति| च.सू.28.7)। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि एक ही अपथ्य आहार जगह, समय, संयोग, वीर्य, व मात्रा की भिन्नता के कारण या ज्यादा खा लेने से और अधिक अपथ्य हो जाता है। वही दोष विविध कारणों से, विरुद्ध चिकित्सा वाला, धातुओं में पहुंचा हुआ, शरीर के प्राणायतनों में उत्पन्न, मर्म पर चोट करने वाला, अत्यंत कष्टदायी अतिशय जल्दी रोगों को उत्पन्न करने वाला होता है|” अंत में आत्रेय यह भी बताते हैं कि मूल रूप से शरीर की बनावट भी नैसर्गिक व्याधिक्षमत्व पर प्रभाव डालती है| “बहुत मोटे या बहुत दुबले लोग, रक्त, मांस, व अस्थियों के सुसंगठित न होने के कारण बेडौल शरीर वाले लोग, दुर्बल, अल्पसत्त्व या कमजोर मनोबल वाले लोगों में रोगों को सहने की क्षमता नहीं होती। जबकि इनके उलट लक्षणों वाले लोगों में रोगों को सहने की क्षमता होती है। इन अपथ्य आहारों, दोषों व शरीर की भिन्नता के कारण बीमारियाँ भी कम या ज्यादा, जल्दी या देर से उत्पन्न होती हैं।”

💫जिस व्यक्ति का सहज (इनेट) या युक्तिकृत (डेराइव्ड) व्याधिक्षमत्व मज़बूत है वह मुश्किल से ही बीमार पड़ता है। यदि बीमार पड़ भी जाये तो बीमारी अपना बल मुश्किल से ही दिखा पाती है| व्याधिक्षमत्व में दो शब्द निहित हैं, व्याधि एवं क्षमत्व| व्याधि का तात्पर्य शरीर की धातुओं (रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र) में विषमता उत्पन्न होना है| क्षमत्व से तात्पर्य इस विषमता को न होने देने की क्षमता है। मानसिक बीमारियों के सन्दर्भ में सत्त्व गुण जितना अधिक होगा, व्याधिक्षमत्व उतना ही बेहतर होगा| शरीर में सहज व्याधिक्षमत्व के सन्दर्भ में यह बात महत्वपूर्ण है कि शरीर में दुरुस्त मांसपेशियों, संरचना, स्वरुप व मज़बूत इन्द्रियों वाला व्यक्ति रोगों के बल से कभी प्रभावित नहीं होता| भूख, प्यास, ठंडी, गर्मी, व्यायाम को ठीक से सहन करने वाला, सम अग्नि वाला, बुढ़ापे की उम्र में ही बूढ़ा होने वाला, मांसपेशियों के सही चय वाला व्यक्ति ही स्वस्थ है (च.सू.21.18): सममांसप्रमाणस्तु समसंहननो नरः| दृढेन्द्रियो विकाराणां न बलेनाभिभूयते|| क्षुत्पिपासातपसहः शीतव्यायामसंसहः| समपक्ता समजरः सममांसचयो मतः||
आधुनिक वैज्ञानिक संदर्भ में व्याधिक्षमत्व को इम्यूनिटी कहा जाता है। यह प्रतिरक्षा तंत्र संक्रमण, बीमारी या अन्य अवांछित तत्वों के आक्रमण से बचने के लिये शरीर को सुरक्षा प्रदान करता है। व्याधिक्षमत्व में कमी होने से शरीर इम्यूनो-कॉम्प्रोमाइज्ड स्थिति में आ जाता है| ऐसी स्थिति में शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होने से रोगजनन आसानी से होता है। इम्यूनिटी किसी व्यक्ति के शरीर में विशिष्ट एन्टीबॉडी या श्वेतरक्त कौशिकाओं की क्रिया से किसी विशेष संक्रमण, विषाक्त पदार्थ या हानिकारी जीवन-शैली से होने वाले रोगों का प्रतिरोध करने की क्षमता के रूप में समझा जाता है।

💫आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इम्यूनिटी मूलतः दो प्रकार से समझी जा सकती है: इनेट (जन्मजात) और एडाप्टिव (अनुकूलनीय)। इनेट-इम्यूनिटी प्रतिरक्षा की पहली पंक्ति है जो पैथोजेन को मारने वाली कोशिकाओं जैसे न्यूट्रोफिल और मैक्रोफेज द्वारा संपादित की जाती है। किसी विषाणु का संक्रमण होने पर ये किलर-सेल्स तेज गति से सबसे पहले अपना काम करती हैं। एडाप्टिव- इम्यूनिटी की क्रियात्मकता तुलनात्मक रूप से धीमी होती है| इस तंत्र में टी-कोशिकाओं, बी-कोशिकाओं और एंटीबॉडी जैसी व्यवस्था है जो विशिष्ट रोगजनकों पर प्रतिक्रिया देता है। यह तंत्र इम्यून-मेमोरी के लिये भी उत्तरदायी है जो मानव में पहले हुई कुछ बीमारियों को पहचानता है और दुबारा नहीं होने देता। मेमोरी बी-सेल नामक कोशिकायें पैथोजेन को पहचानती हैं, और दुबारा संक्रमण होने पर त्वरित-प्रतिक्रिया करते हुये संक्रमण को निष्फल करने का काम करती हैं। हालाँकि नवीन शोध यह बताती है नेचुरल-किलर कोशिकायें भी एडाप्टिव-इम्यूनिटी प्रतिक्रिया का प्रदर्शन कर सकती हैं| जो भी हो, गड़बड़ तब होती है जब कुछ वायरस या माइक्रोब्स अपने पूर्व रूप से म्यूटेट या उत्परिवर्तित होकर इम्यून-मेमोरी (प्रतिरक्षा स्मृति) को गच्चा दे देते हैं।

💫व्याधिक्षमत्व को परिभाषित करते हुये चरकसंहिता के दिग्गज टीकाकार आचार्य चक्रपाणि ने लगभग 900 साल पहले लिखा (च.सू. 28.7 पर चक्रपाणि): व्याधिक्षमत्वं व्याधिबलविरोधित्वं व्याध्युत्पादप्रतिबन्धकत्वमिति यावत्| तात्पर्य यह है कि व्याधिबल की विरोधिता व व्याधि की उत्पत्ति में प्रतिबंधक होना व्याधिक्षमत्व है। अभिप्राय यह है कि शरीर में उत्पन्न बीमारी के बल या तीक्ष्णता को रोकने और बीमारी की उत्पत्ति को रोकने वाली क्षमता को व्याधिक्षमत्व कहा जाता है।
💫व्याधिक्षमत्व को बल, ओज और प्राकृत श्लेष्मा के रूप में भी जाना जाता है| बल वह शक्ति है जिसके द्वारा शरीर विभिन्न चेष्टाओं से कार्य संपन्न करता है। इस कार्योत्पादक शक्ति को व्यायाम-शक्ति से जाना देखा जाता है। बल के तीन प्रकार हैं (च.सू.11.36): त्रिविधं बलमिति- सहजं, कालजं, युक्तिकृतं च| सहजं यच्छरीरसत्त्वयोः प्राकृतं, कालकृतमृतुविभागजं वयःकृतं च, युक्तिकृतं पुनस्तद्यदाहारचेष्टायोगजम्| बल तीन प्रकार के होते हैं| सहज बल शरीर और मन पर आधारित होता है| उम्र के साथ शरीर की वृद्धि से प्राप्त बल को कालज बल कहा जाता है| खान-पान, जीवन-शैली और व्यायाम आदि की युक्ति से प्राप्त बल को युक्तिकृत बल कहा जाता है| रोग से रक्षा करने वाले को बल कहा जाता है। व्याधिक्षमत्व को ओज और ओज को बल के रूप में भी समझा जाता है (सु.सू.15.19) रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत् परं तेजस्तत् खल्वोजस्तदेव बलमित्युच्यते स्वशास्त्रसिद्धान्तात्। रसादिक तथा शुक्रान्त धातुओं के उत्कृष्ट सार भाग को ओज कहते हैं तथा आयुर्वेद के अनुसार उसी का दूसरा नाम बल है| यही बल व्याधियों से शरीर की रक्षा करता है। यहाँ एक बात समझना आवश्यक है ओज और बल हालाँकि एक कहे गये हैं किन्तु ओज को कारण और बल को कार्य माना जाता है| ओज का रूप, रस और वर्ण होने से द्रव्य है जबकि बल इसका कार्य है| यहाँ व्याधिक्षमत्व के सन्दर्भ में बल (कार्य) और कारण (ओज) को एक मान लिया जाता है| इसी सन्दर्भ में प्राकृत कफ को बल या व्याधिक्षमत्व का कारण माना जाता है (च.सू.17.117): प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते। स चैवौजः स्मृतः काये स च पाप्मोपदिश्यते।। यही कारण है कि कफज प्रकृति में उत्तम बल, पित्तज प्रकृति के व्यक्तियों में मध्यम बल तथा वातज प्रकृति के व्यक्तियों में अवर बल होता है।

💫इस प्रकार व्याधिक्षमत्व का तात्पर्य व्याधि-बल का विरोध शरीरगत बल द्वारा किया जाता है। व्याधिक्षमत्व को प्रभावित करने वाले विभिन्न भावों को दशविधि रोगी परीक्षा के भावों में भी देखा जाता है| उदहारण के लिये व्यक्ति की मूल प्रकृति का बल से सीधा सम्बन्ध होता है। सबसे उत्तम सम प्रकृति (वात-पित्त-कफज) है, परन्तु किसी जनसंख्या में समप्रकृति वाले बहुत कम होते हैं। अतः व्यवहार में कफ प्रकृति वालों को बेहतर बल वाला माना जाता है| इसके साथ ही सार भी बल को प्रभावित करता है| सारयुक्त से तात्पर्य यह है कि व्यक्ति में साररूप धातुओं का नियमित निर्माण होता है। सार धातुओं के सम्यक प्रकार से उत्पन्न होते रहने पर शरीर में व्याधिक्षमत्व बढ़िया बना रहता है। जैसा कि पूर्व में चर्चा की गयी है, बल का मुख्य कारक ओज है जो सभी धातुओं का सार है| साररूप में यह सभी धातुओं में व्याप्त होकर धातुओं की रक्षा करता है। व्याधिक्षमत्व को प्रभावित करने वाले अन्य भावों में सात्म्य, सत्त्व, अग्नि, शारीरिक-शक्ति व वय हैं। अग्निबल को आहार करने की क्षमता से परखा जा सकता है| आहार-शक्ति (आहार की मात्रा) अग्निबल पर आश्रित है। यदि व्यक्ति की आहार शक्ति मज़बूत है तो भोजन का पाचन और धातुओं की पुष्टि यथोचित होने से शरीर मज़बूत रहता है। व्यायाम-शक्ति या शारीरिक रूप से श्रम करने की शक्ति भी बल का संकेतक है। व्यक्ति की वय या उम्र का भी बल से संबंध होता है। युवावस्था में उत्तम बल और जरा या बुढ़ापा आने पर बल कम रहता है।

💫व्याधिक्षमत्व बढ़ाने के लिये बल व ओज की वृद्धि में सहायक द्रव्यों और क्रियाओं का इस प्रकार युक्तिपूर्वक नियमित सेवन करना चाहिये, जिससे व्याधिक्षमत्व का संरक्षण व वृद्धि हो किन्तु प्रकृति, अग्नि, धातुओं व मलक्रिया का समत्व तथा आत्मा, इन्द्रियों व मन की प्रसन्नता यथावत बनी रहे| संक्षेप में व्याधिक्षमत्व बढ़ाने के लिये सात रक्षा-दीवारों की निरंतर और सम्यक सार-सम्हाल करना आवश्यक है| इनमें आहार या खानपान, विहार या जीवनशैली, स्वस्थवृत्त या व्यक्तिगत स्वास्थ्य विषयक क्रियायें, सद्वृत्त या व्यक्तिगत सदाचरण, पंचकर्म या शारीरिक विषाक्तता को बाहर करने के लिये आयुर्वेद की पांच प्रक्रियायें, रसायन या उम्र-आधारित रोगजनन को रोकने हेतु कायाकल्प उपाय, और अंततः औषधि या चिकित्सा शामिल हैं। परन्तु वनानुभव इन सबसे ऊपर है। प्रति सप्ताह कम से कम 168 मिनट वनों, उपवनों और हरियाली में बिताइये| यहाँ एक साथ वनवास की बात नहीं है बल्कि प्रतिदिन वनानुभव लीजिये। इससे इम्म्यूनिटी बढ़ने के साथ प्रसन्नता, आत्म-सम्मान, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में धनात्मक सुधार होगा। यह शास्त्र-सिद्ध, शोध-सिद्ध और स्वानुभूत है।
आलेख –
डॉ अनुपम आदित्य मिश्र
एम डी
सीवान

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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 78 वें स्थापना दिवस सह राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस पर मैराथन दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन

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सिवान ;- अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, सिवान इकाई द्वारा विद्यार्थी परिषद के 78 वें स्थापना दिवस सह राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस के अवसर पर गुरुवार को भव्य मैराथन दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता का शुभारंभ राजेंद्र स्टेडियम, सिवान से किया गया,जबकि इसका समापन वी.एम.एच.ई. विद्यालय के पास हुआ। इस आयोजन में जिले के सैकड़ों छात्र-छात्राओं एवं युवाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर स्वस्थ, सशक्त एवं जागरूक भारत के निर्माण का संदेश दिया।कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा झंडी दिखाकर किया गया।इस अवसर पर उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि विद्यार्थी परिषद केवल एक छात्र संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त अभियान है। विगत 78 वर्षों से परिषद छात्र हित, शिक्षा सुधार, सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रहित के विभिन्न विषयों पर निरंतर कार्य करती आ रही है।राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस के अवसर पर आयोजित यह मैराथन युवाओं में स्वास्थ्य, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति एवं सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को जागृत करने का एक सार्थक प्रयास है।अभाविप के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य मनोज गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि विद्यार्थी परिषद का प्रत्येक कार्य समाज एवं राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना से प्रेरित होता है। उन्होंने कहा कि आज का युवा यदि स्वस्थ, जागरूक एवं संस्कारित होगा तो देश का भविष्य और अधिक सशक्त बनेगा। उन्होंने युवाओं से राष्ट्र निर्माण के कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया।इस अवसर पर भाजपा प्रदेश मंत्री मुकेश कुमार बंटी, भाजपा जिला उपाध्यक्ष देवेंद्र गुप्ता, सोनू फिजिकल अकादमी के संस्थापक सोनू कुमार ने भी प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि खेल और शारीरिक गतिविधियां युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। ऐसे आयोजन युवाओं में आत्मविश्वास, अनुशासन एवं सकारात्मक प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करते हैं।कार्यक्रम में अभाविप के वेद प्रकाश चौहान, गोलू दुबे, हर्ष राज, अंशु कुमारी, राहुल कुमार, हर्ष कुमार, अमन कुमार, आर्यन उपाध्याय सहित परिषद के अनेक कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम के सफल आयोजन में परिषद के कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आयोजन के समापन पर सभी प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया गया तथा भविष्य में भी युवाओं को ऐसे रचनात्मक एवं प्रेरणादायी कार्यक्रमों से जोड़ने का संकल्प व्यक्त किया गया।

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“ एक शाम मंगल धाम” : 16 जुलाई को सिवान में होगा भव्य हनुमंत कथा एवं आध्यात्मिक संध्या का आयोजन

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लोकतंत्र न्यूज नेटवर्क,सिवान;- आगामी 16 जुलाई को सिवान में “एक शाम मंगल धाम” के नाम से भव्य आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा।इस आयोजन को लेकर आयोजन समिति की महत्वपूर्ण बैठक एवं प्रेस वार्ता आयोजित की गई, जिसमें कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा एवं तैयारियों की जानकारी मीडिया के माध्यम से आमजन तक पहुंचाई गई।आयोजन समिति ने बताया कि 16 जुलाई को भगवान पैलेस, डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज के समीप, सिवान में मंगल धाम, देवघर के सुप्रसिद्ध हनुमंत कथा वाचक परम पूज्य प्रदीप जी महाराज के श्रीमुख से दिव्य हनुमंत कथा का वाचन होगा। कथा के उपरांत प्रसाद वितरण भी किया जाएगा।समिति ने बताया कि यह कार्यक्रम केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज में आध्यात्मिक चेतना, संस्कार एवं सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने का एक प्रयास है। सिवान एवं आसपास के सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया गया है कि वे अपने परिवार सहित अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस पुण्य अवसर का लाभ उठाएं।आयोजन समिति के संयोजक डॉ. रामेश्वर कुमार, संरक्षक एवं व्यवस्थापक पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष श्री संजय पांडेय, तथा स्वागत अध्यक्ष श्री रूपल आनंद एवं श्री विकास जी ने बताया कि कार्यक्रम की सभी तैयारियां युद्ध स्तर पर चल रही हैं।समिति ने विशेष रूप से जानकारी दी कि सिवान दयानंद आयुर्वेदिक कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य एवं आयुर्वेद जगत के वरिष्ठ विद्वान प्रो. (वैद्य) प्रजापति त्रिपाठी जी के आतिथ्य में परम पूज्य प्रदीप जी महाराज का सिवान प्रवास एवं आवास रहेगा। आयोजन समिति ने इसके लिए प्रो. प्रजापति त्रिपाठी जी के प्रति आभार व्यक्त किया।बैठक में आयोजन समिति के सदस्य लीलावती गिरि, निशा लाल, सुनीता जायसवाल, रश्मि गिरी, प्रियंका भारती, सीमा तिवारी, संजय जायसवाल, निलेश कुमार, शंभू सोनी, सत्यम सिंह, अनमोल जी, रंजन सिंह बादल, मुकेश कुमार बंटी, भाजपा जिलाध्यक्ष श्री राहुल तिवारी, भाजपा युवा मोर्चा अध्यक्ष श्री अजीत चौरसिया, भाजपा जिला उपाध्यक्ष श्री मनोरंजन मिश्रा, प्रदेश उपाध्यक्ष श्री नंदलाल चौहान, श्री हैप्पी यादव, बजरंग दल के श्री रंजन जी, श्रीमती तापती वर्मा, प्रो. डॉ. रविंद्र पाठक, श्री रवि चौरसिया सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे।प्रेस वार्ता के माध्यम से आयोजन समिति ने सिवान एवं आसपास के सभी धर्मप्रेमी नागरिकों से अपील की कि वे इस दिव्य आयोजन की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं तथा 16 जुलाई को परिवार सहित उपस्थित होकर परम पूज्य प्रदीप जी महाराज के श्रीमुख से हनुमंत कथा का श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करें।

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विश्व संगीत दिवस पर संस्कार भारती ने किया संगीत गोष्ठी का आयोजन

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लोकतंत्र न्यूज,सिवान ; – विश्व संगीत दिवस के अवसर पर रविवार 21 जून को संस्कार भारती सिवान द्वारा वीणापाणी संगीत विद्यालय परिसर में एक संगीत गोष्ठी का आयोजन हुआ। गोष्ठी का शुभारंभ संस्कार भारती के संरक्षक श्री बृजमोहन प्रसाद,अध्यक्ष राम प्रेम शंकर एवं विद्यालय के प्राचार्य श्री अजय कुमार द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ। संगीतकार श्री चंद्रमा चंद्राही के निर्देशन में गायक एवं गायिकाओं द्वारा अनेक गीत प्रस्तुत किए गए।संस्कार भारती के श्री विजय शंकर पांडे ने लोकगीत एवं राजू सोनी ने भजन गया। कार्यक्रम में संस्कार भारती के संरक्षक श्री जादूगर विजय,सचिव श्री सुनील कुमार,कोषाध्यक्ष श्री अश्विनी श्रीवास्तव, मिडिया संयोजक डॉ राकेश कुमार तिवारी कार्तिक पांडे, विपुल कुमार सहित अनेक आमंत्रित उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन श्रीमति अंजनी पांडे एवं धन्यवाद ज्ञापन राम प्रेम शंकर सिंह द्वारा किया गया।उक्त अवसर पर समिति के अध्यक्ष राम प्रेम शंकर सिंह जी ने बताया कि संगीत दिवस समरसता का प्रतीक है। वही जादूगर विजय ने कहा कि हम गीत के कलाकार नहीं बल्कि संगीत के साधक बने।विजय शंकर पांडे ने कहा कि संगीत मनुष्य के जीवन में अनिवार्य है। अजय कुमार सिन्हा ने कहा कि संस्कार भारती के द्वारा संगीत गोष्टी बंदिनी है।गोष्ठी में रविंद्र कुमार शर्मा , बृजमोहन प्रसाद ,विकास सोनी, रामप्रवेश,सिवान योग संघ के सचिव सचिन कुमार पर्वत,प्रभाकर श्रीवास्तव, प्रशांत कुमार, ऋषभ कुमार, रंजन कुमार, सरोज कुमारी, मानवी, साक्षी, सोनाक्षी एवं बृजेश कुमार रहे गोष्टी के अंत में सर्व सहमति से निर्णय लिया गया की प्रति माह गोष्टी हो संचालन अनमोल कुमार एवं अंजनी पांडे जी ने किया।

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